Monday, July 11, 2011

संदर्भ : नो प्रेगनेन्सी कांटेक्ट-आम महिला को कोई अधिकार नहीं.

ऐश्वर्या रॉय बच्चन के प्रिगनेंट होने से एक बहस शुरू हो गई है। उनकी फिल्मों के कुछ निर्माताओं के सामने इससे समस्या पैदा हो गई है। स्वाभाविक रूप से ऐश की जिन फिल्मों में काम चल रहा है वे लेट होंगी और इसकी वजह से इसकी नफे-नुकसान के हिसाब किताब लगाए जा रहे हैं। अमिताभ बच्चन ने इस पर कहा कि जब निर्माता दो-दो साल तक फिल्में रिलीज नहीं करते तब तो कोई बात नहीं होती। खैर यह इस लेख का केन्द्रीय मुद्दा नहीं है। इस बहाने आम भारतीय महिलाओं की इस मामले में स्थिति इसके केन्द्र में है।

हमारे समाज की आम महिलाओं की स्थिति की जब बात की जाती है तो आशय सभी महिलाओं से होता है वे चाहे जिस जाति-धर्म की हों। इसमें अपवादों पर हम बात नहीं करेंगे। क्योंकि अपवादहीन शायद ही कोई क्षेत्र होगा और अपवाद उदाहरण नहीं बनते।

महिलाओं में स्वतंत्रता के नाम पर सिर्फ एक चीज उनके पास है वो है पुरूष की मेहरबानी। पुरूष के रूप में भाई-पिता और पति तीनों की स्थिति महिलाओं को लेकर एक जैसी है। इसका आशय यह है कि शादी से पहले उसकी स्वतंत्रता भाई और पिता तथा शादी के बाद पति की मेहरबानी से तय होती है। महिला कोई भी काम करे संबंधित पुरूष की मेहरबानी (अनुमति/सहमति) के बिना मुश्किल है। महिला की सारी आवश्यकताओं - इच्छाओं आदि-इत्यादि को किनारे कर दिया जाए और सिर्फ एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर बात केन्द्रित की जाए कि क्या महिला का प्राकृतिक रूप से भी जिस चीज पर अधिकार बनता है, उसका भी अधिकार उसे हैं-माँ बनने का। या पुरूषवादी सोच में वो आज भी बच्चे पैदा करने की मशीन भर है?

महिला को उसकी इच्छा से माँ बनने का भी अधिकार नहीं है। वो बच्चा कब चाहती है- और कितने चाहती है। ये सब वो खुद नहीं बल्कि उसका पति तय करता है। माँ सिर्फ बच्चा चाहती है लडका या लड़की नहीं- ये च्वाइस पुरूष की होती है। इसीलिए बच्चियों का कत्ल गर्भ में ही कर दिया जाता है और अब नवधनाढ्यों में जेमनोप्लास्टी (बच्चे का लिंग बदलने की तकनीक) से लड़की को लड़का बनाने का चलन शुरू हो गया है।

फिल्मी दुनिया में "जो हो सो कम है" का जुमला सटीक बैठता है लेकिन आम जिन्दगी में ऐसा नहीं होता। इसीलिए "नो प्रेगनेन्सी कांट्रेक्ट" पर फिल्म अभिनेत्री सुष्मिता सेन की प्रतिक्रिया का यहाँ उल्लेख करना सामायिक होगा। उन्होंने कहा कि मेरे घर अगर कोई ऐसा प्रस्ताव लेकर आएगा तो मैं उसे घर के बाहर का दरवाजा बता दूँगी। लेकिन क्या आम महिलाऐं ऐसी हिम्मत कर सकती है कि वे अपने पति से कहे कि उन्हें कब और कितने बच्चे पैदा करने हैं। यह सामान्य सी बात है, महिला को ये अधिकार होना ही चाहिए। लेकिन इतने पर तो महिला की हर किस्मी दुर्दशा हो सकती है।

हमारे समाज में आगे बढ़ी कुछ महिलाऐं प्रतीक तो हो सकती हैं लेकिन प्रतिनिधि नहीं। सवाल समाज की पुरूषवादी सोच को बदलने का है।

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