Tuesday, July 5, 2011

खजानों की संपत्ति को देश हित में लगाओ

हिसाब लगाए जा रहे हैं, मंदिरों के तहखानों से कितनी दौलत मिली है. लेकिन जो संपत्ति मिली है, शायद ये ऊंट के मुंह में जीरे के सामान हो. वो इसलिए की मीडिया में कुछ मंदिरों के बजट बताये जा रहे हैं. कहा जा रहा है, कुछ देशों की तो कुल जी डी पी से भी अधिक है ये संपत्ति. जगन्नाथ पूरी के एक मंदिर की दीवार से कुछ समय पहले चांदी की पुरानी ईंटें निकली थी इनका कुल वजन कई टन था, अब खजाना केरल के मंदिर उगल रहे हैं. जब कोई खजाना सौ-दोसौ साल पुराना है. तो ये समझ में आता है, की ये सम्पति राजे रजवाड़ों के आपसी युध्दों के बाद की लूट और अंग्रेजों की लूट से बचाने के लिए रखी गई सम्पति है. अब सबाल उठता है की राजे महाराजे इस सम्पति को लेकर तो पैदा नहीं हुए होंगे. ये जनता को लूटकर एकत्रित की हुई संपत्ति है. पुराने खजाने तो शुध्द जनता की लूट के पैसे हैं. राजाओं ने आमतौर से मंदिरों को नकदी नहीं दी, जमीन और प्रभुत्व ही सौंपा था. उलटे वे तो अपने वित्तीय संकट को हल करने के लिए मंदिरों और धार्मिक खजानों को लूटते थे.

लेकिन साईं के मंदिर में जो संपत्ति मिली है वो तो इतनी पुरानी नहीं है. उसके बारे में तकरीबन सारी जानकारियाँ उजागर हो चुकी हैं. यहाँ तक की उनके तथाकथित चमत्कारों के बारे में भी लोग जानते हैं.

खैर, खजानों की संपत्ति की गणना करने हमारा मकशद नहीं है, वो इसलिए की ये इतना आसान नहीं है और हम अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ भी नही हैं. ऐसे खजानों का अधिकाँश पैसा-धर्मप्राण, धर्मभीरु जनता का ही है, जो बावजूद गरीबी के इन्हें भगवान् के लोकल काल सेंटर मानकर औकात से अधिक दान देकर आती है.

लेकिन धार्मिक स्थलों से ये खजाना कोई पहली बार नहीं मिला, इससे पहले भी ऐसा हुआ है. और हाँ, सारा देश जानता है की धार्मिक ट्रस्टों के पास अकूत दौलत है. कुछ का तो ये तक कहना है की सभी की संपत्ति जोड़ ली जाए तो ये हमारे देश की जी डी पी के भी पार निकल सकती है.

इस देश की बदहाली पर आंसू बहाए जाते हैं. कहा जाता है-गरीब देश है. इस गरीब देश में- लाखों करोड़ रुपये कालाधन धन है जो देशी और विदेशी बैंकों में जमा है, लाखों करोड़ रुपये भ्रस्टाचार का है और लाखों करोड़ धार्मिक ट्रस्टों के पास. इतना सारा संपत्ति किस लिए है. देश के लिए-नहीं. लेकिन होनी चाहिए.

अब धार्मिक ट्रस्टों को संपत्ति के बारे में किस सरकार की हिम्मत है की कुछ कह दे. लेकिन देश के एक नागरिक की हैसियत से कोई भी ये कह सकता है, की धर्म का काम मानव जाती का उत्थान और खुशहाली आदि है. अगर ये सही है तो धर्म के बड़े अहोदेदारों को आगे आकर देश के लोगों से कहना चाहिए, की जो संपत्ति ऐसी पड़ी है जिसका देश और जनता के विकास में कोई योगदान नहीं हो पा रहा है, सरकार उसे विकास के लिए उपयोग करे. ये बात जितनी आसान लगती है उतनी है नहीं. इसका मतलब ये भी नहीं की ये हो नहीं सकता. पुराने खजानों से मिल रही सारी संपत्ति ज़ब्त की जानी चाहिए. इसे स्कूल, कालेज और स्वास्थ्य के लिए सरकारी निवेश के लिए लगाया जाना चाहिए. इसका एक छोटा सा हिस्सा क्रिकेट को छोड़कर बाकी खेलों के लिए भी लगाया जाना चाहिए. अगर ये पैसा उपरोक्तानुसार देश के गरीबों के उत्थान जैसे पुण्य के काम में लगेगा तो, आम लोग भी खुश होंगे. और देश में खुशहाली आएगी. आने वाली पीढ़ी पढ़ी लिखी, स्वस्थ और सबल होगी.

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